'पर्यावरण दिवस पर छत्तीसगढ़ी कविता'"मै अब्बड़ रोयेव"
हांथ म टंगिया काटत हे सबो जंगल झाड़ी
रूख ह घबरा के देखिस त मै अब्बड़ रोयेव
पेड़ पउधा ह नई होही संगी त हमर का होही
डारा के चिरई मन ल देखेव त अब्बड़ रोयेव
दम खुटय सबो जीव के जिनगी चलही कईसे
मनखे ल बिमार पड़त देखेव त अब्बड रोयेव
का का दवई मिलात हे हमर महतारी माटी म
हरियर बगीचा मुरझात देखेव त अब्बड रोयेव
नदिया नरवा के सुखाय धार सुक्खा कुआं पार
मछरी मन के तरसई ल देखेव त अब्बड़ रोयेव
जंगल कटत हे दिन-रात, कोनो ल नई हे संसो
धरती म बाढ़त भार ल देखेव त अब्बड़ रोयेव
गरमी ह अंगरा कस बरसत हे गांव गांव सहर
छांव बर तरसत मनखे देखेव त अब्बड़ रोयेव
मोर धरती महतारी के पीरा ल समझव रे संगी,
ओकर बिगड़त सिंगार देखेव त अब्बड़ रोयेव
हरियर हरियर रिहिसे सुग्घर हमर गांव शहर।
गली गली मोहल्ला ल देखेव त अब्बड रोयेव।।
छत्तीसगढ़ म रूख रई ल काटत हे चुन चुन के।
मोर गांव के हालात ल देखेव त अब्बड रोयेव।।
आव मिलके रूख लगाबो, हरियर धरती बनाबो,
अवईया हमर पीढ़ी बर सुग्घर संसार ल सजाबो
फेर चिरई गाही गीत मया के, फेर जंगल मुस्काही,
धरती के नवा सिंगार ल देखके अब मै नई रोयेव।
-- देव हीरा लहरीचंदखुरी फार्म रायपुर


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