उलझन भरी जिन्दगी : डॉ. दीपिका लहरी
फर्ज करो ये मसले न होते
फर्ज करो ये कहानी न होती
फर्ज करो अगर हम न होते
यूं उलझनों में जिंदगी न होती।
मैं हजार सवाल करती चुप बैठकर
तू जवाब तलाशता खामोशी में मेरे
कुछ राहतें हम फिजाओं में ढूंढते
कुछ पतझड़ फूलों का घर तलाशती।
चीखते चिल्लाते, अंधेरे कमरे मे
अपनी गूंज सुन खुद सहम जाते
समेटते उन टूटे रिश्तों के टुकड़ों को
जिसको हमने कभी जाना ही नहीं।
शिकवा आंखों में मोहब्बत आंसुओ के लिए
जिन आंसुओ को हमने कभी समझा ही नहीं
जब कुछ हासिल न हो तो दुनिया से लड़ते
सही गलत से परे सच और झूठ से बेगाने।
और थक हारकर वापिस
उस छोटे से घरौंदे में लौटते
जो पाक था बेकसूर था
जिसका अस्तित्व हम लोगों में ढूंढते रहे।
डॉ. दीपिका लहरी (एम.डी.)
चंदखुरी फार्म रायपुर (छ.ग.)



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